संस्मरण-खुली किताब
व्यक्ति का जीवन खुली किताब सी हो या नहीं?
अपने रोजी रोटी के सिलसिले में हाल ही में एक मित्र के पास एक रात मुझे रुकना पड़ा।
मेरे मित्र अधिक सफल और मेधावी हैं,और उन्होंने अपने को साबित भी कर दिखाया है।यह भी कि उन्होंने अखिल भारतीय स्तर की कई परीक्षाओं में अपना दम दिखाया है।
हमलोग रात का खाना खुद ही बना रहे थे। बीच बीच में इधर-उधर से मेरा तो कभी उनका मोबाइल बज उठता था। वैसे मैं किसी के निजी मामलें में दखल नहीं देता।
फिर भी उनकी बात सुनकर लगा, दखल देना चाहिए। फिर भी चुप रहा।
बात ये थी कि बातों ही बातों में मित्र ने मोबाईल पर दूसरे व्यक्ति को सलाह देते हुए कहा- "देखों,भाई! दूसरों के सामने खुली किताब मत बनों, किताब पढ़कर लोग फेंक देते हैं। अच्छा तुम्हीं बताओं,कोई किताब पढ़ने के बाद दुबारा हाथ लगाता हैं कि उठाकर कोने में रख देता है?"
उधर से क्या जबाब फोन पर मिला पता नहीं।लेकिन मित्र की बात दूसरे व्यक्ति ने शायद मान ली थी। इसलिए मित्र ने ये कहकर अपनी बात खत्म की,"वही तो हम भी कह रहे हैं।आपके बारे में सब जानने के बाद आपकी कद्र नहीं रहेगी,किसी को।"
मैं यह सुनकर मुस्कुराया,लगा मित्र मुझे भी नसीहत दे रहे हैं। क्योंकि मैं भी जल्दी खुल जाता हूँ,अपनों के बीच।
उनकी बात आगे चलती रही,मुझे आगे ध्यान नहीं रहा।
मेरी उनसे इस बात पर असहमति थी,लेकिन बाद में यह बात ध्यान में नहीं रही और अगली सुबह तैयार हों, हम अपने अपने गंतव्य स्थान की तैयारियों में लगे रहे।
बात आई-गई हो गई।
लेकिन मेरे मन में यह बात घूम फिरकर आती रही कि खुले विचारों का आदमी हो या खुली किताब।एक के काम आने के बाद दूसरे के काम तो आया ही जा सकता है।
मन में ये बात भी चलती रही कि जब तक आदमी हो या किताब,अपने चाहने वालों के लिए खुले नहीं तो वह अपने असली अंजाम तक नहीं पहुँच सकता/सकती। अब अंजाम अच्छा भी हो सकता हैं,और बुरा भी।
ख़ैर,
किताबें पढ़कर फेंक दी जाती तो पुस्तकालय नहीं होते।
पढ़ने वाले न होते तो दिन प्रतिदिन प्रकाशक न बढ़ते।
हो सकता है कि खुले विचारों के आदमी को ठग मिल जाये तो ठग लें,लूट ले.लेकिन यह भी तो हो सकता है कि सज्जन व्यक्ति मिल जाये जो ईश्वर के बाद धरती पर एक मात्र प्रिय मित्र हो,सखा हो,सम्बन्धी हो या हो कोई अपना सगा।
बाद में विचार में यह भी आया कि हमारे इतने योग्य मित्र 'खुली किताब' होने के पक्ष में इसलिए नहीं कि इसके अपने खतरे हैं।लेकिन बिन खतरों के जीवन में रस कहाँ हैं?
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©शम्भू
सारण गोपालगंज बिहार।
9/11/2021
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