मेरी नजर में साहित्यिक नारीवाद
मेरी नजर में साहित्यिक नारीवाद
कल मुझसे एक लघुकथा का जन्म हुआ,नाम था, 'सुसाइड'। यह एक सत्य घटना केंद्रित कथा थी।
इसको लिखने के पीछे दो ही कारण है।एक तो यह कि समाज में पुरुष आज किस स्थिति में है,उसको सामने लाना।
दूसरा,पुरुषों की दयनीय दशा पर कुछ नहीं लिखा गया है साहित्य में,इसलिए स्त्रियों के बराबर में पुरुषों की लाचारी और प्रताड़ना से भरे सामाजिक, आर्थिक,राजनीतिक और कानूनी प्रक्रिया से लहूलुहान होते पुरुषों की आवाज को दूर तक पहुँचाना।
बस इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए मैं अधिक से अधिक पढ़ता हूँ। जहां नहीं बर्दाश्त होता,लिखता हूँ। उसी की उपज है, 'सुसाइड'।
'सुसाइड' पढ़कर मेरे प्रिय श्रेष्ठ रचनाकारों ने मेरा उत्साह बढ़ाया। इनमें आदरणीय छतीसगढ़ के साहित्यकार व पत्रकार सुरेश वाहने जी,दिल्ली से आदरणीय रचनाकार सन्दीप तोमर जी और छत्तीसगढ़ से साहित्यकार श्री आलोक कुमार सातपुते जी।
लगभग सभी सहित्य समूहों में मैंने पोस्ट कर दिया।
विभिन्न साहित्यिक समूहों में पुरूष लेखकों के साथ महिला लेखकों ने बढ़-चढ़कर सराहा,सहमत हुए और अपनी अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणियों से अवगत कराया।
इस बीच मैं 'लघुकथा के परिंदे' समूह में अपनी लघुकथा सुसाइड पाठकों तक पहुंचाने में सफल हुआ।सभी के सकरात्मक विचार आ रहे थे कि आज मैंने पाया कि मेरी लघुकथा परिंदे से उड़ा दी गई है। मैं हैरान हूँ एडमिन पैनल से।
इस समूह में सिर्फ़ ऐसे लोग एडमिन है कि वे बहू प्रताड़ना प्रधान लघुकथाओं की समीक्षा और स्वीकृति देते हैं।उससे इतर वे न लिखते हैं,न पढ़ते है,औऱ न कहीं देखते हैं। मैं ऐसे नारीवाद को आतंकवाद के रुप में देखता हूँ।
ऐसे ही एक समूह है 'साहित्य संवेद' उसमें भी एडमिन ऐसी ही लघुकथाओं को तरजीह देते हैं,महिला प्रताड़ना से इतर बात करने वालों पर टूट पड़ते हैं।
ये दोनों समूह, समय समय पर साझा संकलन निकालते हैं।और ऐसे ही रायता फैलाकर पुरुषों को बदनाम करते है। उसमें भी सहयोगी पेटीकोट वाले पुरुष यह मानते है कि यह सब सही है। मतबल पुरुष जन्म से ही बलात्कारी, व्यभिचारी, अत्याचारी होता है। वे अपने साहित्य में यही दिखाते है।जबकि महिलाओं ने भी बढ़ चढ़कर सभी आपराधिक,अत्याचारी गतिविधियों में हिस्सा लिया है,ले रही है इसके गवाह रोज के देश भर के दैनिक समाचार पत्र है। चूंकि नारीवाद से बड़ा व्यवसाय जुड़ा है नारी के खिलाफ बड़े मीडिया घराने कुछ नहीं दिखाते,बोलते है।इसलिए पुरूष अत्याचार और महिला अत्याचार का प्रचार भेदभावपूर्ण तरीके से किया जाता है।
मेरे कहने का उद्देश्य सीधा सा यह है कि किसी भी अपराध को पुरूष या स्त्री नजरिये से न देख सिर्फ़ अपराध और अपराधी की नजर से देखा जाय।यही उम्मीद,मैं साहित्यकारों और पत्रकारों से करता हूँ।
अगर आप अपनी बात रखते हैं तो दूसरे को भी अपनी बात मर्यादा में रखने का मौका दीजिये।अन्यथा आप स्वस्थ समाज बनाने के हितैषी नहीं है,नहीं जान पड़ते।
अंत में दो शब्द,सिर्फ पुरुषों का अपराधीकरण बन्द कीजिये।यह अब नहीं चलेगा।
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©शम्भू
सारण गोपालगंज, बिहार
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