अजीब पाठक कहानी- 2
अजनबी पाठक की कहानी-2
मैं कुछ दिनों से भारतीय वायु सेना की शक्ति को बढ़ाने वाले एक प्रोजेक्ट पर व्यस्त था।इसके पूरा होने के साथ ही हम भी दूसरे देशों की तरह छोटे युद्धक सामग्री बेच पाएंगे।बहरहाल,इस बीच अजनबी पाठक की कहानी लिखनी है,दिमाग में चलती रही।मैं उसकी कहानी इसलिए भी लिखना चाहता था ताकि वह मेरे संपर्क में बना रहे।मेरी रचनाओं को ईमानदार पाठक भी तो चाहिए था। उससे अच्छा, भला कौन पाठक रहा मेरा, लम्बे समय तक।
फुर्सत में,मैंने 'अजनबी पाठक' से फेसबुक मैसेंजर में कहा कि आगे की कहानी बताओं। उसने जो जबाब दिया, वो ये हैं-
डॉ. सिंह साहब, सन 2018 में पी.राजन मुझसे केरल से फेसबुक पर जुड़े।उनके इकलौते लड़के ने आत्महत्या कर ली थी।फेसबुक पर और दिल्ली एनसीआर में,वे उन दिनों अपने लड़के के लिए इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहे थे। साथ में फ़ेसबुक पर इंसाफ़ के लिये जन समर्थन जुटा रहे थे। उनके मामले को पढ़कर मैं भी उनके फेसबुक पोस्ट को शेयर कर दिया।क्योंकि मुझे दया और दुःख मेहसूस हुआ।
कारण,पी.राजन के पोस्ट में मृतक की नवविवाहित पत्नी और मासूम सा उसका 3 साल का लड़का,उसकी माला चढ़ी हुई फ़ोटो लेकर मोमबत्ती जलाते हुए इंसांफ की मांग कर रहे थे।उनके पीछे मृतक के बूढ़े माँ-बाप भी मोमबत्ती लिये हुए खड़े थे। एक तख्ती पर लिखा था,जस्टिस फ़ॉर स्वरूप राजन।
स्वरूप राजन के पिता पी.राजन से आप ही की तरह पहले मैसेंजर में,फिर फोन से बात होने लगी थी।
पी.राजन ने मुझे बताया कि उनका लड़का गुड़गांव स्थित एक बहु-राष्ट्रीय कम्पनी में वाईस प्रसिडेंट था। अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर उसने यह मुकाम मात्र 35 वर्ष की उम्र में और उस कम्पनी में 8 वर्ष के सेवाकाल में हासिल की थी।स्वरूप राजन ऑफिस के कार्यों में इतना समर्पित हुआ करता था कि कई बार रात की बची रोटियां खाकर ऑफिस निकल पड़ता था, जब भी सुबह के नाश्ते में देर हो जाती थी।
उसका कहना था कि जब तक उसका बच्चा छोटा है,तब तक नाश्ते बनाने में हुई देरी को उसकी पत्नी दिल पर न लें,रात का खाना भी वह होटल से कभी कभार ले आता था।पत्नी की व्यस्तता को समझते हुए वह उसके कामों को खुद निपटा देता था। उसकी पत्नी,हमें केरल फोन करके बताती थी कि वे उसे घर के काम नहीं करने देते है।
पी.राजन रुंधे गले से बोले- ऐसा था मेरा बेटा स्वरूप
अजीब पाठक- सर,लेकिन ऐसे हुआ कैसे?
पी. राजन-
एक दिन उसकी बहस कम्पनी के दो महिला सहकर्मियों से हो गई। बहस का कारण ऑफिस में अधिकतर समय उनका मोबाइल पर लगे रहना था।इस वजह से कम्पनी का काम प्रभावित होता था। बेटा कम्पनी की उत्पादन क्षमता कम नहीं होने देना चाहता था। इसलिए उन्हें ऑफिस में मोबाइल पर चैटिंग न करने की कई बार हिदायत दे चुका था। लेकिन उन पर असर नहीं हुआ था।
ये ऑफिस की बातें स्वरूप राजन अपनी पत्नी को भी बताते रहता था।
एक दिन स्वरूप राजन को सबक सिखाने के लिए महिला कर्मियों ने कम्पनी के बोर्ड मेंबर्स को लिखित शिकायत दी। शिकायत सेक्सुअल हरासमेंट का था।
उसी समय देश में #metoo केम्पेन सोसल मीडिया पर चला था।चारों तरफ सोशल मीडिया पर किसी न किसी तरफ़ बड़ी शख्शियतों पर अपने साथ पूर्व में हुई सेक्सुअल हरासमेंट की आपबीती महिलाएं और लड़कियां लिख रही थी। देश की पुलिस उस लिखें को आधार मानकर बड़ी हस्तियों को आड़े हाथों ले रही थी।
इसी लहर में कम्पनी ने दबाव में आकर स्वरूप राजन को तत्काल टर्मिनेशन का लेटर थमा दिया। वर्षों की कड़ी मेहनत को बिना आरोपों की जाँच किये कम्पनी द्वारा उसे तत्काल हटाया जाना, बड़े सदमे से लगा। कम्पनी द्वारा उसे इस तरह हटाया जाना ऐसा लगा मानों,कम्पनी पहले ही उसको दोषी मान चुकी है।
उसने सोचा सबकी नजरें उसे काटती दौड़ेंगी,मानों पूछ रही हो इतना गिरने की क्या जरुरत थी।इतने लोगों को वह कैसे समझाता फिरेगा कि मामला बदले की भावना से प्रेरित हैं। वे काम पर ध्यान नहीं देती थी, बल्कि मोबाइल पर व्यस्त रहती थी।
चाहे वह बाद में बेगुनाह ही साबित क्यों न हो जाय।कलंक तो नहीं मिट पायेगा।मरकर वह कम से कम अपनी पत्नी, बेटे और बुजुर्ग मां बाप की नजर में तो दोषी नहीं रहेगा।
वह सदमें को बर्दाश्त नही कर सका और सुसाइड नोट में अपनी बेगुनाही की बात पत्नी,लड़के और हमारे लिए लिख छोड़ गया।
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मैंने अपने अजनबी पाठक द्वारा अपनी कहानी बताने की बात पूछीं तो वह पी.राजन के इकलौते वाईस प्रसिडेंट पुत्र के बारे में बता गया।
मैं ये सोच रहा था कि उससे ये पूछूं कि तुमने मुझसे अपनी कहानी लिखने के लिए कही थी। फिर ये क्यों…
मैं कुछ पूछ पाता तब तक मेरे घर पर मेरे दो दोस्त आ गए और आगे की बातें वही छोड़नी पड़ी।
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©शम्भू
8-09-21
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