साफ़ साफ़
हंस पत्रिका में कुछ कहानियों पर मेरे क्षेत्र के एक लेखक महोदय का पत्र छपा।
प्रतिक्रिया काफी गहरी,रोचक और बेबाक थी।
उत्साहित हो,मैंने फोन लगा दिया।(कारण, हंस का पाठक पास में ही है,और मैं उनसे अपरिचित क्यों रहूँ।)उधर से बुजुर्ग व्यक्ति की आवाज आ रही थी।
अपना नाम और गाँव बता पत्रिका में छपी उनकी प्रतिक्रिया से बात शुरु होकर तमाम हिंदी के पूर्व और समकालीन साहित्यकारों पर चर्चा हुई। पता चला अंग्रेजी के रिटायर्ड प्रोफेसर साहब है,सुदीप मिश्रा जी।
तीस मिनट के बाद-
"लम्बू जी,एक बात पूंछू, साफ़ साफ़ बताएंगे न?"
"हाँ,क्यों नहीं। जरूर बताएंगे,सर।अगर जानकारी हुई तो।"
सहमति देते ही तुरन्त उन्होंने पूछा,"आपकी जात बिरादरी क्या हैं?"
यह सुन,मैं सोच में पड़ गया।
जबाब देने में देरी होने लगी।
उधर से मिश्रा जी फिर पूछे -चुप क्यों हो गए,लम्बू जी,बोलिये न?बोला था न, साफ़ साफ़ बताएंगे।
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©शम्भू✍️
सारण गोपालगंज, बिहार
15 नवंबर 2021
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