वैवाहिक रिश्ते और उपजातियों में बंटे लोग
काफी समय से ओबीसी की कुछ प्रमुख जातियों के वैवाहिक सम्बन्धों को बनाने में सहयोग कर रहा हूँ।
परेशानी की बात ये है कि इसमें भी लोग अपनी ही उपजाति में सम्बंध करना अधिक पसंद कर रहे है।
जिसके कारण मनमाफिक रिश्ता होकर भी नहीं बन पा रहा है। ऐसे लोगों के लिए विकल्प कम हो जाने के कारण सही समय पर रिश्ता नहीं हो पा रहा है। कुछ लोग तो चार पांच साल से प्रयास में लगे है। फिर भी बात नहीं बन पा रही हैं।
इसके पीछे सबंधित जाति में अपनी उपजाति को सर्वश्रेष्ठ मानने और दूसरों को कमतर मानने की एक ग्रन्थि बनी हुई है, जो एक लाईलाज बीमारी है।
कई बार हर क्षेत्र में आगे बढ़ चुके परिवारों को भी उनकी उपजाति के कारण हेय दृष्टि से देखने की कुदृष्टि है। ऐसा देखने वालों में पढ़े लिखे लोग भी है और विभिन्न हिन्दू पूजा पाठ में(दुर्गा पूजा,सरस्वती पूजा) समिति में निरन्तर रहने वाले लोग भी है।
कमाल की बात ये है कि ऐसे पूजा समितियों में अगड़े पिछड़े सहित सब जातियां औऱ उप जातिया होती है।और ये पूजा पाठ शांतिपूर्ण सम्पन्न होते है। ऐसा परस्पर मेलजोल और एक दूसरे की सम्मान करने की परंपरा से ही सम्भव होता है।
फिर भी विवाह के समय इतना पिछड़ापन वाला निंर्णय!
हैं न ग़जब के लोग!
हालांकि ये लोग अपने लड़के के लिये किसी भी उपजाति से लड़की लेने में कोई बुराई नहीं मानते है। ये प्राचीन काल के राजाओं की तरह कहीं से सुंदर और सुशील रानी को घर लाना बहादुरी का काम समझते है।
इसके विपरीत सवर्ण समाज में ऐसा नहीं है। वे अपने और माता जी के कुल को छोड़कर किसी भी अपनी उपजाति में सबंध कर लेते है।
कुछ लोगों का ऐसा मानना है कि ऐसा करने से बौद्धिक संपदा और प्रतिभाए निखरती है।
ख़ैर, जो भी हो ओबीसी समाज हो या अन्य पिछड़ी भारतीय जातियां, कम से कम उपजातियों के भेदभाव से ख़ुदको और परिवार को बचाने की जरूरत है।
इससे यह भी सिद्ध होता है कि पिछड़ेपन की जड़े हममें कितनी मजबूत है।
और हाँ,इन्हें उखाड़ने के लिये जिगरा तो चाहिए ही।
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✍️©शम्भू
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