मेरी रेलयात्रा/अनुभव

मेरी रेलयात्रा/अनुभव

जहाँ सब लोग शादी व्याह में व्यस्त है। वहीँ कुछ लोग रोजी रोटी तो कुछ लोग पढ़ने,इलाज कराने व् शादी व्याह से निपट  दिल्ली जाने वाली रेलगाड़ी के सामान्य श्रेणी के डिब्बे में सवार हो,बिहार से दिल्ली जा रहे है।  मैं भी उन्हीं में शामिल हूँ। समय के आभाव के कारण reservation नहीं कराया।

करा भी लेता तो सीट मिल जाती यह उसी तरह है जैसे बेरोजगारी में सरकारी नौकरी का अनुभव अत्यंत दुष्कर है।

डिब्बे में सवार होने के लिये आपातकालीन खिड़की का सहारा लेना पड़ा।वह भी उस खिड़की के सहारे बैठे यात्री से अनुनय विनय के बाद।यह सौभाग्य मुश्किल से प्राप्त हुआ।

घुसते ही इस सर्दी में भी बैसाख की गर्मी का एहसास होने लगा।
मैंने अपने माथे से टोपी उतार छोटे से बैग में रख टांग दिया जहाँ पहले से ही बहुत से झोले और बैग लटक रहे थे।

पहले से इस रेलगाड़ी में बैठे इलाहाबाद कुम्भ के श्रद्धालु भी कम नहीं थे जो पूर्वी बिहार से चढ़े होंगे।किसी भी नये चढ़ते यात्री से कुत्ते सा व्यवहार करते है। इधर नहीं,इधर कहाँ जगह है। गुर्राते हुए,भौं भौं...

सीट पर बैठे महिला श्रद्धालुओ का समूह उंगता हुआ पैर फ़ैलाये ऐसे बैठे है जैसे गाँव चबूतरे पर फैला बड़ का पेड़।खड़े आदमी को पैर बदलने की जगह भी नहीं देना चाहते। ख़ैर दोष इनका नहीं, मेरी समझ का है।

रात होने लगी है। सब माल जाल की तरह जहाँ जगह मिली, वही पड़े जा रहे है।

बात लघुशंका की दूर,उसके बारे में सोचने से ही रूह कांप जाये। आखिर यात्रियों से भरे रेल डिब्बे में हिमालय की सी, लोगों पर कठिन चढ़ाई,ऊपर से कदम कदम पर यात्रियों की 'इधर नहीं' का विरोध का सामना कमांडो प्रशिक्षण प्राप्त जवान ही कर पाये जैसी स्थिति है।

बाकि यात्रियों का पता नहीं पर मुझे यह सोचकर अजीब सा डर लग रहा है कि कहीं बीच में लघुशंका न लग जाये।मन ही मन खुश हो रहा हूँ कि गाड़ी आने के 5 मिनट के अंदर दो बार अत्यंत जरूरी काम कर पाया वर्ना स्थिति कुछ और होती।

मुझे याद आ रहा है ऐसी ही यात्रा मेरे दादा जी ने मुझे सन् 2000 में कराई थी,नई दिल्ली के लिए। मुझे कानपूर में इसी आपातकालीन खिड़की से निकाल अत्यंत जरूरी काम का मौका दिलवाया था।आज फिर मेरे सेवा में वैसे ही खिड़की है। तब मैं 12 या 13 साल का रहा हूँगा। किन्तु आज 2019 में 30 -32  वर्ष का पुरुष यह कैसे करेगा??

अनुभव जारी है ,भारतीय रेल बिहारियों के लिये कल भी वही थी,आज भी वही है।

भीड़ से ठसा ठस भरी बिहार से आने-जाने वाली रेलगाडियां भले ही रेलवे का राजस्व बढ़ाये।किन्तु निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के लिये काला पानी की सज़ा से कम नहीं। फिर भी मेरे जैसे व्यक्ति को साल दो साल में एक यात्रा बिहार से बाहर न चाहते करनी पड़ती है।

यात्री और गाड़िया जरूर बढ़ें है,किन्तु बिहारियों का दुःख रेल यात्रा का वही है।
आखिर ये दिन कब बदलेंगे?
बदलेंगे या नहीं। संशय है। लेकिन जो भी होगा अच्छा होगा।
जय बिहार
✍️2 मार्च 2019
©शम्भू

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