निजी स्कूल की पुस्तकें अंडे की दुकान में।
पोस्ट की तस्वीरें देखकर आप समझ गए होंगे कि पोस्ट किस बारे में है।
जी, हां,मैं बात कर रहा हूं,अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों की पुस्तकों के बारे में,उनकी दुर्दशा के बारे में। किस कदर निम्न मध्यवर्गीय परिवार लूटे जा रहे है।
आपने हर साल देश के कोने कोने में ऐसी पुस्तकें कबाड़े में बेची जाती अवश्य देखीं होंगी।इसके साथ ही लूटी जा रही है,वन संपदा।जिसके कच्चे सामग्री से पुस्तकों के लिए कागज़ मिलता है।
ली गई तसवीरें कक्षा तीन की विज्ञान विषय की है।पुस्तक का मूल्य ₹165 रुपये है। पूछने पर की ये पुस्तक इस तरह क्यों बर्बाद की जा रही है,दिखने में आकर्षक औऱ बिन फ़टी है?
तो जबाब मिला,बगल के विद्यालय में पढ़ने वाले मोनू की पुस्तक है।अब वह अगली कक्षा में चला गया है।इसलिए अब इस पुस्तक का कोई काम नहीं।
ये तो एक विषय की पुस्तक हुई।निजी स्कूलों में एक कक्षा में करीब आठ पुस्तकें होती है,जिनका मूल्य आमतौर पर पाँच हजार के करीब पहुँचता है। और ये हर साल बदल जाती है।
आइये एक मोटामोटी हिसाब लगाते है।
एक अनुमान के मुताबिक एक जिले में करीब सौ निजी विद्यालय का हिसाब और उसमें पढ़ने वाले औसतन सौ बच्चे भी हुए तो हिसाब एक विद्यालय का 5000×100=पाँच लाख होगा। अब एक जिले में 100 विद्यालयों का आंकलन करें तो पाँच लाख × प्रति विद्यालय 100 विद्यार्थियों की संख्या= पाँच करोड़ किताबों पर खर्च हुए।
इस तरह देश में करीब 726 जिले है तो अंदाजा लगाएं कि लूट और बर्बादी कितनी भारी हो सकती है!
बच्चा अगली कक्षा में जाता है,फिर से वही शोषण,लूट व जबरन नई किताबें खरीदने के लिए अभिभावकों को विवश किया जाता है।पुरानी किताबें पुनः कबाड़े में जाती है या किसी अंडे वाले या खोमचे की दुकान पर ऐसे ही नोच नोच क़र कुर्बान कर दी जाती है जैसे पोस्ट में है।
क्या निजी स्कूलों की पुरानी पुस्तकें पिछली कक्षा के बच्चों को बेची नहीं जा सकती है?
ऐसा करने से दर भी कम लगेगा और अनावश्यक खर्च से भी बच्चों के अभिभावक बच जाएंगे!
लेकिन इस बारे में किसी को मतलब है, ऐसा दिखता नहीं है!
इस पर ठोस नियम बनाने की भी जरूरत है और उसको सख्ती से पालन करवाने की जरुरत है ताकि देश के अरबो रूपये हर साल न फूँके जाए।मेहनकशों की मेहनत की कमाई बर्बाद न हो।
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©शम्भू खुजलीवाला
सारण गोपालगंज बिहार
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