मेरी साहित्यिक पाठकीय कमी
मेरी साहित्यिक पाठकीय कमी...
वे कवि/लेखक अपने समय में अधिक पढ़े जाते है और लोकप्रिय होते हैं जो युगीन परिस्थितियों के संदर्भ में अपने विचार/भाव व्यक्त करते है। ये सर्वदा सच है भारतीय साहित्यिक परम्परा पर नजर डाले तो।
फेसबुक पर मैं उन्हीं कवियों और लेखकों को पसन्द करता हूँ जो सामयिक सन्दर्भ में लिखते है।उसमें भी बहुआयामी लेखन हो तो सोने पर सुहागा।
बाकी जो निरन्तर लिखते है लेकिन इस बात का ध्यान नहीं रखते उन्हें पढ़ने में जाने क्यों रुचि घटती जाती है बेशक वे अपने पद और काबिलियत का लोहा मनवा चुके होते है।
नमक का दारोगा,पूस की रात आदि प्रेमचंद की कालजयी कहानियों का विश्लेषण पढ़ते हुए,भारतेंदु,हरिऔध का प्रथम खड़ी बोली का महाकाव्य 'प्रियप्रवास',मैथिली शरण गुप्त, महादेवी, जयशंकर प्रसाद,निराला,परसाई,जैनेंद्र आदि लेखकों औऱ कवियों को पढ़ते हुए यही समझ आता है।
अगर बात करें अंग्रेजी दिग्गज साहित्यकारों की तो भी यही बात सामने आती है।यथा शेक्सपियर, थॉमस हार्डी,जॉर्ज बर्नाड शॉ,केट चोपिन,सलमान रश्दी, तस्लीमा नसरीन आदि।
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#शम्भूखुजलीवाला
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